Wednesday, May 14, 2014

क्यों बचपन खो जाता है

जो निश्छल था, निर्मल था,
अपने अभावों मे संतुष्ट और सरल था;
वो बचपन याद आता है।
जब पापा की बाहें झूला झूलाती थीं,
और माँ की थपकी चुपके से सुला जाती थी;
जब परियों कि कहानियाँ मन बहलाती थी,
और जीवन की कोई चिंता हमें छु भी नहीं पाती थी;
वो भोलापन याद आता है।
जब कागज़ की कश्ती नाव बन जाती थी,
और शादी के बाद गुड़िया मेरे पास  वापस आ  जाती थी;
जब एक अठन्नी भी अमीर महसूस कराती थी,
और छोटी छोटी खुशियों से झोली भर जाती थी;
वो सादापन याद आता है।
क्यों वो भोलापन पीछे छूट गया,
क्यों वो सादापन मुझसे रूठ गया,
बार बार मुझको वो जीवन  याद आता है,
क्यों बचपन खो जाता है?
क्यों बचपन खो जाता है?
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                                              आकांक्षा रंजन 

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