कभी नभ से टूटते तारे को देखा है?
गगन से छूट मिट्टी में मिलते देखा है?
नभ का दुलारा होता है हर तारा ,
गगन की उचाइयों में बसता है हर तारा;
पर उसकी स्थिति स्थायी नहीं होती,
पतन से परे उसकी उँचाई नहीं होती.
जीवन के भिन्न चरणों से गुजरता है हर तारा,
अपनी चमक से नभ को रौशन करता है हर तारा;
पर उसके जीवन का भी अंत आता है,
वह भी टूट कर गगन से छूट जाता है.
नभ की ऊँचाई में बसने वाला,
मिट्टी की गर्द में विलीन हो जाता है.
फिर भी नभ में अंधकार नहीं होता,
अपने दुलारे के जाने पर गगन नहीं रोता;
उत्थान और पतन, जुदाई और मिलन,
जीवन का चक्र पूरा करते हैं;
हम एक ही स्थिति में हर पल नहीं रहते है.
पतन के डर से परिवर्तन से भाग नहीं सकते,
जुदाई के डर से मिलन की खुशियाँ त्याग नहीं सकते..
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आकांक्षा रंजन