Prakriti : A poem highlighting our relation with nature :)
कभी मद्धम होते सूरज की रौशनी में
नहा कर देखा है ?
कभी चहचहाती चिड़ियों के संग
गुनगुना कर देखा है?
कभी खेतों में लहलहाती फसलों के संग
बलखा कर देखा है?
कभी जेठ की दुपहरी में झूमते पेड़ो की छाव में
सुस्ता कर देखा है?
क्या तुमने कभी अपने सुविधासंपन्न जीवन का पर्दा
हटा कर देखा है?
ये खेत, ये खलिहान; ये तालाब, ये बागान;
ये सिर्फ ग्रामीणों के नहीं,
ये इंसानों के है!
ये नदियाँ, ये झड़ने; ये खाईयां, ये हिमशिखर;
ये सिर्फ पहाड़वासियों के नहीं,
ये इंसानों के है!
ये पेड़, ये जंगल; ये पशु, ये पक्षी;
ये सिर्फ आदिवासियों के नहीं,
ये इंसानों के है!
इनसे रिश्ता बना कर तो देखो,
प्रकृति के करीब जा कर तो देखो।
बुलंद होती इमारतों के बीच,
पेड़ों की छाव में ही सुकून मिलेगा।
तेज़ होते गाड़ियों के शोर के बीच,
चिड़ियों की चहचहाहट से ही मन शांत होगा।
बंद कमरों में घुटती कल्पनाओं को,
खेतों की पगडंडियों में ही आसरा मिलेगा।
प्रकृति को स्वयं से दूर मत होने दो,
इन एहसासों को इतिहास में मत सिमटने दो।
तरक्की की इस दौड़ में,
कोई अपना पीछे छूट गया है।
हमें पीछे लौटना नहीं,
उसे संग लेकर आगे बढ़ना है।
हमें नए सिरे से शुरुआत नहीं करनी,
बस छुटे सिरों को जोड़ना है।
आओ हम सब बाहें फैलाएं,
आलिंगन कर दूर जा रही प्रकृति को पास लायें।
कभी मद्धम होते सूरज की रौशनी मेंनहा कर देखा है ?
कभी चहचहाती चिड़ियों के संग
गुनगुना कर देखा है?
कभी खेतों में लहलहाती फसलों के संग
बलखा कर देखा है?
कभी जेठ की दुपहरी में झूमते पेड़ो की छाव में
सुस्ता कर देखा है?
क्या तुमने कभी अपने सुविधासंपन्न जीवन का पर्दा
हटा कर देखा है?
ये खेत, ये खलिहान; ये तालाब, ये बागान;
ये सिर्फ ग्रामीणों के नहीं,
ये इंसानों के है!
ये नदियाँ, ये झड़ने; ये खाईयां, ये हिमशिखर;
ये सिर्फ पहाड़वासियों के नहीं,
ये इंसानों के है!
ये पेड़, ये जंगल; ये पशु, ये पक्षी;
ये सिर्फ आदिवासियों के नहीं,
ये इंसानों के है!
इनसे रिश्ता बना कर तो देखो,
प्रकृति के करीब जा कर तो देखो।
बुलंद होती इमारतों के बीच,
पेड़ों की छाव में ही सुकून मिलेगा।
तेज़ होते गाड़ियों के शोर के बीच,
चिड़ियों की चहचहाहट से ही मन शांत होगा।
बंद कमरों में घुटती कल्पनाओं को,
खेतों की पगडंडियों में ही आसरा मिलेगा।
प्रकृति को स्वयं से दूर मत होने दो,
इन एहसासों को इतिहास में मत सिमटने दो।
तरक्की की इस दौड़ में,
कोई अपना पीछे छूट गया है।
हमें पीछे लौटना नहीं,
उसे संग लेकर आगे बढ़ना है।
हमें नए सिरे से शुरुआत नहीं करनी,
बस छुटे सिरों को जोड़ना है।
आओ हम सब बाहें फैलाएं,
आलिंगन कर दूर जा रही प्रकृति को पास लायें।
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