Saturday, March 8, 2014

स्त्री की आवाज़


मैं चीख हूँ;
मैं चीत्कार हूँ;
मैं भय हूँ;
मैं गुहार हूँ;
मैं दर्द हूँ;
मैं हाहाकार हूँ;
मैं स्त्री कि आवाज़ हूँ।
जब मैं चीख बनी,
दबा दी गयी।
जब मैं चीत्कार बनी,
गला घोंट दी गयी।
जब मैं भय बनी,
किनारे कर दी गयी।
जब मैं गुहार बनी,
ठुकरा दी गयी।
जब मैं दर्द बनी,
नज़रअंदाज़ कर दी गयी।
जब मैं हाहाकार बनी,
अनसुनी कर दी गयी।
और नहीं, बस, अब और नहीं,
इतना सहना भी नहीं सही।
अब मैं हूंकार हूँ,
हर ज़ुर्म का प्रतिकार हूँ।
ना कोई मुझे दबायेगा,
ना गला घोंट किनारे लगाएगा;
ना कोई मुझे ठुकराएगा,
ना नज़रअंदाज़ कर अनसुनी कर पाएगा;
सुन रही मैं वक़्त की पुकार हूँ,
हाँ......  हाँ......  मैं हूंकार हूँ।
अब मैं ही स्त्री कि आवाज़ हूँ;
मैं ही उसका प्रतिकार हूँ;
हाँ.....  हाँ.....  मैं हूंकार हूँ।

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                                 आकांक्षा रंजन

1 comment:

siddhartha said...

हे नारी, अब और न सेहन करना,
तुम हो दुर्गा, कालरात्रि, इन पापियों का दहन करना..
कानून बनेंगे, मुकदमो का दौर चलेगा,
इस देश में "पाप" अभी और फलेगा,